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क्यों है इतना विह्वल मेरा मन!

क्यों है इतना विह्वल मेरा मन!

सानिध्य तुम्हारा कुछ पल का है;
यह तो क्षुण नंदन भर छलका है !
विचलित भविष्य है जीवन का,
सोंच यह, तीव्र हो उठता स्पन्दन; 
क्यों है इतना विह्वल मेरा मन!

जीवन को चिर विकलता देकर;
भ्रांत निशा आ रही अवसान लेकर!
विरह वेदना से हृदय को भर देगी;
अभी सुनहरी संध्या का है आलिंगन!
क्यों है इतना विह्वल मेरा मन!

पद चिह्नों का लहरों से मिट जाना;
अकल्पनीयता का यूँ ही घट जाना,
क्या कुछ थिर रह पायेगा जीवन में,
असह्य हो जायगा यह विछ्लन;
क्यों है इतना विह्वल मेरा मन!

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  1. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 18/08/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

इंतजार, इंतजार करो

तुम्हें याद होगा!
नीली रोशनी में
काँपते हुए  
नीले होंठों से कहा था-
"--------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
सावन की हल्की  फुहारों में
सकुचाते ह्रदय से कहा था- 
"------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
अंगीठी के पास
लाल सुर्ख चेहरे  से 
शर्माते हुए कहा था- 
"----------------!" 

और यह कहती हुई 
मुझे तनहाई में  
सन्नाटे देकर चली गयी- 
" इंतजार, इंतजार करो ! "