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क्यों है इतना विह्वल मेरा मन!

क्यों है इतना विह्वल मेरा मन!

सानिध्य तुम्हारा कुछ पल का है;
यह तो क्षुण नंदन भर छलका है !
विचलित भविष्य है जीवन का,
सोंच यह, तीव्र हो उठता स्पन्दन; 
क्यों है इतना विह्वल मेरा मन!

जीवन को चिर विकलता देकर;
भ्रांत निशा आ रही अवसान लेकर!
विरह वेदना से हृदय को भर देगी;
अभी सुनहरी संध्या का है आलिंगन!
क्यों है इतना विह्वल मेरा मन!

पद चिह्नों का लहरों से मिट जाना;
अकल्पनीयता का यूँ ही घट जाना,
क्या कुछ थिर रह पायेगा जीवन में,
असह्य हो जायगा यह विछ्लन;
क्यों है इतना विह्वल मेरा मन!

टिप्पणियाँ

  1. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 18/08/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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