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हे मेरे मानव प्रियवर, मैं भी मानव हूँ !


हे मेरे मानव प्रियवर,
मैं भी मानव हूँ;

तुम करते आशाएं,
मिले न मुझसे निराशाएं;
करता मैं भी प्रयास पर,
इस जग में मैं भी अभिनव हूँ;

हे मेरे मानव प्रियवर,
मैं भी मानव हूँ;


तुम चाहते
मेरे कर्मों में न त्रुटि हो,
कैसे करूं कर्म,
जिससे तुम्हें भी संतुष्टि हो;
फिर भी जीवन में कर्मरत हूँ,
तेरा ही तो बांधव हूँ;

हे मेरे मानव प्रियवर,
मैं भी मानव हूँ;


चल रहा द्वंद्व मेरे भी
अंतर भंवर में,
दया,द्वेष,प्रेम, हर्ष है ,
मेरे भी उर में;
नहीं मैं सर्वग्य,
मैं भी अतिगव हूँ;

हे मेरे मानव प्रियवर,
मैं भी मानव हूँ;


तुम चाहते
जीवन के झंझावातों में सहारा दूं;
लहरों की थपेड़ों में,
डगमग होती नाव  को किनारा दूं;
तुम समझते वट विटप,
मै भी पल्लव हूँ;

हे मेरे मानव प्रियवर,
मैं भी मानव हूँ;


माया प्रपंच से
मैं भी व्योमोहित हूँ;
समर्पित हूँ पूर्ण
पर कामना से लिप्त हूँ;
नहीं मैं अमर्त्य
मैं भी अवयव हूँ;
हे मेरे मानव प्रियवर,
मैं भी मानव हूँ;


संघर्ष तो
जीवन का आलम्बन है'
सहिष्णु होना तो
मानव का स्वालम्बन है;
महाकाल से
मैं भी अतिभव हूँ
हे मेरे मानव प्रियवर,
मैं भी मानव हूँ!
  ?

टिप्पणियाँ

  1. मानवता जिसका धर्म हो, कर्म हो वही मानव है ... सार्थक रचना...आभार

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  2. प्रभावी प्रस्तुति |
    शुभकामनायें आदरणीय ||

    उत्तर देंहटाएं
  3. behad utkrust Rachna ..Badhai
    संघर्ष तो
    जीवन का आलम्बन है'
    सहिष्णु होना तो
    मानव का स्वालम्बन है;
    http://ehsaasmere.blogspot.in/

    उत्तर देंहटाएं

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक
हमको हमारा ये चराग मुबारक।

तुम क्या मुकम्मल करोगे मसलों को,
तुम्हें ही तुम्हारा जवाब मुबारक।

हो सकते थे और बेहतर हालात,
रख लो, तुम्हें तुम्हारा हिसाब मुबारक ।

सूरत बदलने से नहीं बदलती सीरत,
तुमको ये तुम्हारा नया हिजाब मुबारक।

खुद ही खुद तुम खुदा बन बैठे हो
तुम्हें यह तुम्हारा खिताब मुबारक।

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक
हमको हमारा ये चराग मुबारक।