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आह्वान !



तोड़ दो सपनो की दीवारे,
मत रोको सृजन के चरण को ,
फैला दो विश्व के वितान पर,
मत टोको वर्जन के वरण को !

जाने कितनी आयेंगी मग में बाधाएँ,
कहीं तो इन बाधाओं का अंत होगा ही .
कौन सका है रोक राह प्रगति की ,
प्रात रश्मियों के स्वागत का यत्न होगा ही !

प्रलय के विलय से न हो भीत,
तृण- तृण  को सृजन से जुड़ने दो
नीड़ से निकले नभचर को
अभय अम्बर में उड़ने दो,

जला कर ज्योति पुंजों को ,
हटा दो तम के आवरण को ,

तोड़ दो सपनो की दीवारे,
मत रोको सृजन के चरण को!
     ?

टिप्पणियाँ

  1. "तोड़ दो सपनों की दीवारें
    मत रोको सृजन के चरणों को " बहुत सुन्दर और भावपूर्ण पंक्तियाँ |
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  2. जला कर ज्योति पुंजों को ,
    हटा दो तम के आवरण को ,

    तोड़ दो सपनो की दीवारे,
    मत रोको सृजन के चरण को!
    बहुत ही भावमय करते शब्‍द ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्‍दर.....नयापन लिए हुए कविता।

    उत्तर देंहटाएं
  4. सृजन के चरणों की सुन्‍दर पदचाप.

    उत्तर देंहटाएं
  5. बोधगम्य सृजन ...अन्तर्निहित भावों को मुखरित करते हुए प्रवाहमयी .....

    उत्तर देंहटाएं
  6. तेज-ओज से परिपूर्ण आह्वान। सुन्दर अलंकृत शब्द चयन। सार्थक रचना। पहली बार आना हुआ आपके ब्लॉग पर। बहुत अच्छा लगा।
    ~ मधुरेश

    उत्तर देंहटाएं
  7. सुन्दर कविता...बिलकुल सही कहा है सृजन की निरंतरता बनी रहनी चाहिए.

    उत्तर देंहटाएं
  8. जला कर ज्योति पुंजों को ,
    हटा दो तम के आवरण को ,

    तोड़ दो सपनो की दीवारे,
    मत रोको सृजन के चरण को!
    बहुत सुंदर भावमय प्रस्तुति
    New post कुछ पता नहीं !!! (द्वितीय भाग )
    New post: कुछ पता नहीं !!!

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत सुंदर सोच! बहुत सुंदर अभिव्यक्ति! यही सकारात्मकता ही प्रगति का मूल मंत्र है...
    ~सादर!!!

    उत्तर देंहटाएं
  10. प्रलय के विलय से न हो भीत,
    तृण- तृण को सृजन से जुड़ने दो
    नीड़ से निकले नभचर को
    अभय अम्बर में उड़ने दो,

    भाव मय ... सृजन की रह खोजती ...

    उत्तर देंहटाएं

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

इंतजार, इंतजार करो

तुम्हें याद होगा!
नीली रोशनी में
काँपते हुए  
नीले होंठों से कहा था-
"--------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
सावन की हल्की  फुहारों में
सकुचाते ह्रदय से कहा था- 
"------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
अंगीठी के पास
लाल सुर्ख चेहरे  से 
शर्माते हुए कहा था- 
"----------------!" 

और यह कहती हुई 
मुझे तनहाई में  
सन्नाटे देकर चली गयी- 
" इंतजार, इंतजार करो ! "