शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

रेत पर बिखरा प्रेम!


मुझे मालूम है
नहीं हो सकती तुम मेरी !

उम्र भर यादों के सहारे,
जीने का असफल प्रयास 
करोगी तुम!


लेकिन घर, समाज और 
झूठे सिद्धांतों का 
प्रतिरोध करने की 
हजार कोशिशों बाद भी 
हिम्मत न जुटा पाओगी !

और मै
तुम्हारा इन्तजार 
करते-करते,
आखिरी सांस को 
पीछे छोड़ने में
लगा हूँ !

यह प्रेम 
कितना क्रूर है
जो  दो जिंदगियों को 
किश्तों में जीने को 
मजबूर कर देता है!

या शायद:
मैं तुम्हारे मिथ्या 
प्रेम को यथार्थ 
मान कर सब कुछ
समर्पित करता चला गया!
जिसे तुमने एक 
रेत के घरोंदे सा 
मानकर स्मृतियों से
मिटा दिया !

   ?
-- 

7 टिप्‍पणियां:

  1. या शायद:
    मैं तुम्हारे मिथ्या
    प्रेम को यथार्थ
    मान कर सब कुछ
    समर्पित करता चला गया!
    जिसे तुमने एक
    रेत के घरोंदे सा
    मानकर स्मृतियों से
    मिटा दिया !
    yah ek soch ho sakta hai
    New post कृष्ण तुम मोडर्न बन जाओ !

    उत्तर देंहटाएं
  2. रेत के घरोंदे सा...........इसमें रेत के की जगह रेत का करें।
    मानकर स्मृतियों से
    मिटा दिया !

    पीड़ित प्रेमाभिव्‍यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर रचना,भावों की उम्दा अभिव्यक्ति,,,

    गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाए,,,
    recent post: गुलामी का असर,,,

    उत्तर देंहटाएं

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