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क्या हूँ मैं?


मुझे वो पढ़ता रहा 
गढ़ता रहा 
कभी एलोरा की गुफाओं ,
कभी पिकासो की
मनः स्थितियों में!

लेकिन 
कभी वो नहीं 
बदल सका 
अपनी संकुचित 
और शंकालु 
प्रवृत्ति 
और 
डसने को 
तत्पर रहता है
हर क्षण !

और आज तक मैं
अनभिज्ञ  ही रही 
मेरा अस्तित्व 
और मैं क्या हूँ 
इस पुरुष प्रवृत्ति 
के लिए !
  ?

टिप्पणियाँ

  1. स्‍त्री मन की स्‍वाभाविक अकुलाहट।
    अन्तिम अन्‍तरे में "अस्तित्‍व" शब्‍द ठीक कर लें।

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 09/01/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत अच्छे भाई साहब ..आज कल की दशा पर तंज छोडती हुई रचना

    recent poem : मायने बदल गऐ

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर रचना...
    पुरुष होते हुए स्त्री मन को समझने के लिए आपको नमन...

    विकेश जी की बात पर गौर करें
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  5. स्त्री के अंतर्मन की व्यथा का सुन्दर चित्रण !

    उत्तर देंहटाएं
  6. और आज तक मैं
    अनभिग्य ही रही
    मेरा अस्तित्त्व
    और मैं क्या हूँ
    इस पुरुष प्रवृत्ति
    के लिए !
    भावपूर्ण रचना..

    उत्तर देंहटाएं

  7. दिनांक 07/01/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  8. कविता और कहानियों में उसकी शस्खियत जितनी रंगीनी से दिखाई जाती है काश सच उतना स्याह न होता. सुन्दर अभिव्यक्ति.

    उत्तर देंहटाएं
  9. वजूद के सृजन और खुद के मूर्तिकरण की बेजोड़ प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  10. सुन्दर रचना ,बढ़िया अभिव्यक्ति
    New post :अहंकार

    उत्तर देंहटाएं
  11. ये सच है कि भारतीय समाज पुरूष प्रधान है परंतु ये भी सच है कि भारतीय संविधान स्त्री प्रधान है । आपकी कवितायें बहुत बढि़या हैं ।

    उत्तर देंहटाएं

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक
हमको हमारा ये चराग मुबारक।

तुम क्या मुकम्मल करोगे मसलों को,
तुम्हें ही तुम्हारा जवाब मुबारक।

हो सकते थे और बेहतर हालात,
रख लो, तुम्हें तुम्हारा हिसाब मुबारक ।

सूरत बदलने से नहीं बदलती सीरत,
तुमको ये तुम्हारा नया हिजाब मुबारक।

खुद ही खुद तुम खुदा बन बैठे हो
तुम्हें यह तुम्हारा खिताब मुबारक।

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक
हमको हमारा ये चराग मुबारक।