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जिजीविषा जीवन की !


जीना चाहते हो!
क्या जीने की 
जिजीविषा 
शेष है तुममें 
या समयपूर्व 
मर चुकी है !!


जब तुमें 
संवेदनाओं की 
अनुभूति ही 
नहीं होती तो 
फिर जीवन और 
मृत्यु में 
क्या अंतर शेष है?
फिर क्यों जीना 
चाहते हो !

पर अफ़सोस 
हर कोई जीवन की 
जिजीविषा में
जीवन को 
लक्ष्य हीन बना कर
मृत प्राय हो गया है !

न जाने कब 
पल-दो-पल का ही 
लक्ष्य पूर्ण जीवन 
जी पायेगा ये 
भ्रमित मनुष्य !

टिप्पणियाँ

  1. न जाने कब
    पल-दो-पल का ही
    लक्ष्य पूर्ण जीवन
    जी पायेगा ये
    भ्रमित मनुष्य !
    ......................प्राय: ये अनुभूति सभी संवेदनशील लोगों को होती है। बहुत अच्‍छा प्रयास।

    उत्तर देंहटाएं
  2. सच कहा आपने आज मनुष्य सच में भ्रमित है ...
    सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  3. न जाने कब
    पल-दो-पल का ही
    लक्ष्य पूर्ण जीवन
    जी पायेगा ये
    भ्रमित मनुष्य !

    वास्तविकता को दिखती सुंदर रचना |

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर रचना ......मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है

    उत्तर देंहटाएं
  5. जीवन के सही रूप को दर्शाती
    बहुत कहीं गहरे तक उतरती कविता ------बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

इंतजार, इंतजार करो

तुम्हें याद होगा!
नीली रोशनी में
काँपते हुए  
नीले होंठों से कहा था-
"--------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
सावन की हल्की  फुहारों में
सकुचाते ह्रदय से कहा था- 
"------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
अंगीठी के पास
लाल सुर्ख चेहरे  से 
शर्माते हुए कहा था- 
"----------------!" 

और यह कहती हुई 
मुझे तनहाई में  
सन्नाटे देकर चली गयी- 
" इंतजार, इंतजार करो ! "