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आह्वान !



तोड़ दो सपनों की दीवारें 
मत रोको सृजन के चरण को!
फैला दो विश्व के वितान पर;
मत टोको वर्जन के वरण को !

कितनीं आयेंगी मग में बाधाएँ ,
बाधाओं का कहीं तो अंत होगा ही 
कौन सका है रोक राह प्रगति की ;
प्रात रश्मियों के स्वागत का यत्न होगा ही!

नीड़ से निकले नभचर को 
अभय अम्बर में उड़ने दो!
प्रलय के विलय से न हो भीत,
तृण - तृण  को सृजन से जुड़ने दो !
जला कर ज्योति पुंजों को 
हटा दो तम के आवरण को !
तोड़ दो सपनों की दीवारें 
मत रोको सृजन के चरण को!

कंचन कामिनी और कीर्ति का 
जग हेतु तुम परित्याग कर दो ;
फूंक प्राण चेतना के उर में,
नव सृजन का अनुराग भर दो!

कुंठित कुंठाओं का क्लेश हार ,
नव आश का सनचार कर दो!
मिटाकर दानवता इस जग से ;
मानवता का शृंगार कर दो !

विस्मृत कर निज वेदना को ;
रोक लो तुम निर्मम प्रहरण को !
तोड़ दो सपनों की दीवारें 
मत रोको सृजन के चरण को!

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बेख्याली

न जाने किस ख्याल से बेख्याली जायेगी; जाते - जाते ये शाम भी खाली जायेगी। गर उनके आने की उम्मीद बची है अब भी, फिर और कुछ दिन  मौत भी टाली जायेगी। कुछ तो मजाज बदलने दो मौसमों का अभी, पुरजोर हसरत भी दिल की निकाली जायेगी। कनारा तो कर लें इस जहाँ से ओ जानेजां, फिर भी ये जुस्तजू हमसे न टाली जायेगी । कि ख्वाहिश है तुमसे उम्र भर की साथ रहने को, दिये न जल पाये तो फिर ये दिवाली  जायेगी।

मतलब का मतलब......

 मतलब की दुनिया है-जानते सभी हैं, फिर भी यहाँ मतलब निकालते सभी हैं। अपनापन एक दिखावा भर है फिर भी, जाहिर भले हो लेकिन जताते सभी हैं। झूठी शान -ओ-शौकत चंद लम्हों की है, ये जानते हुए भी दिखाते सभी हैं। नहीं रहेगी ये दौलत सदा किसी की,  जमाने में पाकर इठलाते सभी हैं। मौत है मुत्मइन इक न इक दिन आएगी, न जाने क्यूँ मातम मनाते सभी हैं।

क्या हूँ मैं?

मुझे वो पढ़ता रहा  गढ़ता रहा  कभी एलोरा की गुफाओं , कभी पिकासो की मनः स्थितियों में! लेकिन  कभी वो नहीं  बदल सका  अपनी संकुचित  और शंकालु  प्रवृत्ति  और  डसने को  तत्पर रहता है हर क्षण ! और आज तक मैं अनभिज्ञ   ही रही  मेरा  अस्तित्व  और मैं क्या हूँ  इस पुरुष प्रवृत्ति  के लिए !   ?