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प्रश्न ?

कि आज पुन: ,
जीवन को न्यायालय में
अपराधों और आरोपों के
समक्ष स्वयं को प्रस्तुत
करना पड़ा!

यही जीवन जो कभी
धन्य हुआ था गीता के
कर्म पथ पर प्रेरित
करने वाले दर्शन से;

यही जीवन जो कभी
वेदों की ऋचाओं के पावन
स्पर्श से हुआ था अमर ,

क्यों रे कलुषित
और कलंकित ,
अनन्त काल के
व्यथित पथिक;
किस दंड से होगा
तेरा चिर त्राण !

क्षण -प्रति क्षण
होकर भ्रमित , भटक रहा
व्योमोहित ,
क्यों कर रहा
व्यर्थ अप्राप्य श्राम?

ढोकर इन नीरस प्राणों को,
किस गंतव्य की खोज में
गतिमान है तेरा पंच हय
यह नश्वर स्यन्दन !

पर क्या उत्तर देता
ये जीवन ,
अनुत्तरित ही गतिज बना
अनन्त की ओर!
 

  

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बेख्याली

न जाने किस ख्याल से बेख्याली जायेगी; जाते - जाते ये शाम भी खाली जायेगी। गर उनके आने की उम्मीद बची है अब भी, फिर और कुछ दिन  मौत भी टाली जायेगी। कुछ तो मजाज बदलने दो मौसमों का अभी, पुरजोर हसरत भी दिल की निकाली जायेगी। कनारा तो कर लें इस जहाँ से ओ जानेजां, फिर भी ये जुस्तजू हमसे न टाली जायेगी । कि ख्वाहिश है तुमसे उम्र भर की साथ रहने को, दिये न जल पाये तो फिर ये दिवाली  जायेगी।

मतलब का मतलब......

 मतलब की दुनिया है-जानते सभी हैं, फिर भी यहाँ मतलब निकालते सभी हैं। अपनापन एक दिखावा भर है फिर भी, जाहिर भले हो लेकिन जताते सभी हैं। झूठी शान -ओ-शौकत चंद लम्हों की है, ये जानते हुए भी दिखाते सभी हैं। नहीं रहेगी ये दौलत सदा किसी की,  जमाने में पाकर इठलाते सभी हैं। मौत है मुत्मइन इक न इक दिन आएगी, न जाने क्यूँ मातम मनाते सभी हैं।

क्या हूँ मैं?

मुझे वो पढ़ता रहा  गढ़ता रहा  कभी एलोरा की गुफाओं , कभी पिकासो की मनः स्थितियों में! लेकिन  कभी वो नहीं  बदल सका  अपनी संकुचित  और शंकालु  प्रवृत्ति  और  डसने को  तत्पर रहता है हर क्षण ! और आज तक मैं अनभिज्ञ   ही रही  मेरा  अस्तित्व  और मैं क्या हूँ  इस पुरुष प्रवृत्ति  के लिए !   ?