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प्रश्न ?

कि आज पुन: ,
जीवन को न्यायालय में
अपराधों और आरोपों के
समक्ष स्वयं को प्रस्तुत
करना पड़ा!

यही जीवन जो कभी
धन्य हुआ था गीता के
कर्म पथ पर प्रेरित
करने वाले दर्शन से;

यही जीवन जो कभी
वेदों की ऋचाओं के पावन
स्पर्श से हुआ था अमर ,

क्यों रे कलुषित
और कलंकित ,
अनन्त काल के
व्यथित पथिक;
किस दंड से होगा
तेरा चिर त्राण !

क्षण -प्रति क्षण
होकर भ्रमित , भटक रहा
व्योमोहित ,
क्यों कर रहा
व्यर्थ अप्राप्य श्राम?

ढोकर इन नीरस प्राणों को,
किस गंतव्य की खोज में
गतिमान है तेरा पंच हय
यह नश्वर स्यन्दन !

पर क्या उत्तर देता
ये जीवन ,
अनुत्तरित ही गतिज बना
अनन्त की ओर!
 

  

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