बुधवार, 20 जून 2012

वजूद : मेरा ये तुम्हारा !

मेरे ही वजूद में  तुम 
समा जातेहो सवजूद !
फिर भी अखरता है 
तुम्हें ये मेरा वजूद !

जब-जब तुम्हे हुयी  मेरी जरूरत,
मिन्नते की गिड़-गिड़ाये और 
न जाने कितने सपने दिखाए,
फिर अपना वजूद दिखाने के लिए 
तिरष्कृत किया और मेरे ही अस्तित्व को 
मिटाने का प्रयास करते रहे !
हे पुरुष! धन्य है , 
तुम्हारे वजूद की आकांक्षा
और विडम्बना !

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