शनिवार, 16 जून 2012

निशा का अवसान !!


व्यर्थ है
ज्योतिपुन्जों को
प्रज्ज्वलित करना !
पी कर अमृत
चिर हो गयी
ये तमिस की निशा !
सभी मनीषी
छिप  गये कहीं 
उस अँधेरे 
धूमिल के कुंएं में !
अब तो हर गली  
में मिल जाते हैं
नए-नए अरस्तू,
पर वे विचारों से ही
अब रह गये हैं कुरूप!
लेकिन अब कैसे भी करो,
इस युग को चाहिए
निशा का अवसान !!

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

अन्य पठनीय रचनाएँ!

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...