सोमवार, 11 जून 2012

मुझे वह मूल्य चाहिए!

मुझे वह मूल्य चाहिए!
जो मैंने चुकाया है,
तुम्हारे ज्ञान प्राप्ति हेतु,
हे! अमिताभ;
मुझे वह मूल्य चाहिए!

क्या पर्याप्त नहीं थे वो
चौदह वर्ष! कि पुनः
त्याग दिया सपुत्र!
तुम तो मर्यादा पुरुष थे
हे पुरुषोत्तम !
मुझे वह मूल्य चाहिए!

और हे जगपालक !
मेरा पतिव्रता होना भी
बन गया अभिशाप!
और देव कल्याण हेतु;
भंग कर दिए
स्व निर्मित नियम !
हे जगतपति !
मुझे वह मूल्य चाहिए!

पर सोंच कर परिणाम;
दे रही हूँ क्षमा दान,
क्योंकि मेरा त्याग
न हो जाय कलंकित और मूल्यहीन!
रहने दो इसे अमूल्य;
नहीं!  वह मूल्य चाहिए!

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