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अपवृत्त

किस व्यथा से है व्यथित
किस हेतु कर रहा पश्चाताप
मिथ्या से होकर भ्रमित,
क्यों कर हो रहा तीव्र संताप!


निज को तू कब पहचानेगा
किस भ्रम से है अब भ्रमित ;
पूर्ण का अपूर्ण अंश है तू
व्यर्थ स्व को कर रहा श्रमित!


तज निज की अब यह तन्द्रा
स्वप्न मरीचिका से हो जागृत;
नश्वर है जो नहीं शास्वत ,
सर्व से ही है आगत-विगत !


अपूर्ण को कर दे पूर्ण,
वह पुन्य पथ है निर्वाण का;
अन्य पथ सभी भ्रम के;
करेंगे बाधित लक्ष्य त्राण का!


यह है तृष्णा की तपिश जो,
तू पुकारे हा तृष्णा, हा तृष्णा ;
होकर भ्रमित कृतिका से,
कर रहा तू ये जीवन मृष्णा!


फल की लिप्सा में तू क्यों कर,
कर्मच्युत हो रहा जीवन में !
जीवन तो है क्षणिक पर,अब
लक्ष्य चिंतन कर मन में !

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बेख्याली

न जाने किस ख्याल से बेख्याली जायेगी; जाते - जाते ये शाम भी खाली जायेगी। गर उनके आने की उम्मीद बची है अब भी, फिर और कुछ दिन  मौत भी टाली जायेगी। कुछ तो मजाज बदलने दो मौसमों का अभी, पुरजोर हसरत भी दिल की निकाली जायेगी। कनारा तो कर लें इस जहाँ से ओ जानेजां, फिर भी ये जुस्तजू हमसे न टाली जायेगी । कि ख्वाहिश है तुमसे उम्र भर की साथ रहने को, दिये न जल पाये तो फिर ये दिवाली  जायेगी।

मतलब का मतलब......

 मतलब की दुनिया है-जानते सभी हैं, फिर भी यहाँ मतलब निकालते सभी हैं। अपनापन एक दिखावा भर है फिर भी, जाहिर भले हो लेकिन जताते सभी हैं। झूठी शान -ओ-शौकत चंद लम्हों की है, ये जानते हुए भी दिखाते सभी हैं। नहीं रहेगी ये दौलत सदा किसी की,  जमाने में पाकर इठलाते सभी हैं। मौत है मुत्मइन इक न इक दिन आएगी, न जाने क्यूँ मातम मनाते सभी हैं।

क्या हूँ मैं?

मुझे वो पढ़ता रहा  गढ़ता रहा  कभी एलोरा की गुफाओं , कभी पिकासो की मनः स्थितियों में! लेकिन  कभी वो नहीं  बदल सका  अपनी संकुचित  और शंकालु  प्रवृत्ति  और  डसने को  तत्पर रहता है हर क्षण ! और आज तक मैं अनभिज्ञ   ही रही  मेरा  अस्तित्व  और मैं क्या हूँ  इस पुरुष प्रवृत्ति  के लिए !   ?