गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

तपिश


कितनी सुर्ख
 हो रही धूप,
शीतल हो चुका;
 अब सूरज
सारी उसकी गर्मी 
समा गयी ,
इस पुरानी
 सर्द धूप में! 

जब घुटन ने
 घोंट दिया दम 
 का ही गला,
तो घोंटने को
दम घुटन
 कहाँ जाय !

लाल आग को 
पीकर चल पड़ी ,
जाड़े की रातें;
लीलने उस जाड़े को
जिसके आते ही
जाग पड़तीं  थीं,
वो सर्द रातें!!

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