रविवार, 25 दिसंबर 2011

अतीत की स्मृति लहरी

अतीत की स्मृति लहरी ,
क्यों कर तरंगित होती है?
निशीथ की इस बेला में,
क्यों व्यथा व्यथित बोती है/

पान्थ है जब पथ पर गतिज,
फिर क्यों यह बाधित होता है?
व्यतीत काल के कलरव से,
क्यों यह अंतस व्यथित होता है?

 वेदना की व्यथा से होकर व्यथित ,
 लक्ष्य पथ से क्यों हो रहा विचलित/
 क्या कर्म पथ था त्रुटिपूर्ण जो अब
 निर्वाण पथ से कर रहा विछ्लित/


क्या कुछ शेष रहा विशेष जो,
 करता तनमन को तपित,
 इस अटवि में आकर भी तू
 भ्रमित, तृषित सा है शापित


जीवन के निर्जन कानन में ,
 करता था नित नाव नंदन /
 श्रृद्धा पूर्ण था जीवन समर्पण ,
 भावना पूर्ण था देव वंदन /


था शांत स्थिर तटस्थ पर,
 करता था नूतन अभिनन्दन /
 सुख-दुःख ,राग द्वेष से हीन,
 मधुकामना से निर्लिप्त मन /


निष्पादित अश्रांत जीवन ,
 निर्वेद के रह्स्योंमीलानोद्यत /
 करता था मैं जीवन तपस्कर,
 लक्ष्य संधान हेतु था उद्यत /


जीवन लक्ष्य था मात्र निर्वाण ,
 कर्तव्य पथ पर था प्रबाध/
 गतिमान था महाकाल का चक्र ,
 आशा पूर्ण था जीवन निर्बाध /


जीवन की इस निशीथ बेला में ,
 क्यों विस्तृत होता कृतिका विवृत्त /
 है क्या शेष विस्मृत विशेष?
 या की रह गया जीवन निवृत्त !


स्मृति व्यतीत की जीवन को,
 कर देती है जब विकल /
 अंतस के गह्वर तम से ,
 विह्वल होता उर सकल /


स्मृति अतीत की कर देती स्पंदन तीव्र ,
 उर प्रांगण को कर उद्वेलित विह्वल /
 कर्म पथ पर पथिक हो जाता भ्रमित ,
 अप्राप्य की तृष्णा हो उठती तीव्र प्रबल /


इन वासित स्मृतियों में ,                                                    
 क्यों यह वेदना है पलती ?
 अश्रुओं की निस्त्रा क्यों कर ,
 है दृगांचल में मचलती ?

 ज्यों एक प्रस्तर खंड तड़ाग के ,
शांत तोय को कर देता है तरंगित /
 ज्यों वरिदों के घर्षण का गर्जन ,
 जड़ चेतन को कर देता है कम्पित/
जाने क्यों होताहै स्मृत अतीत,
कुछ रहा शेष अब जीवन व्यतीत/
तृष्णा तृप्त हुआ, था जिज्ञाषा हीन,
आश्रांत था तन, निः श्वास समाधिलीन/

जाने कैसी आह वेदना की,
अब पुन: उर में उपजती है?
इस निर्जन अटवी में क्यों,
स्मृतियों की रागिनी बजती है?
स्थिर नीरस जीवन में वो स्मृतियाँ,
निस्तब्ध निशा में भी शोर फैलाती हैं/
निशांत के नक्षत्र सी द्युतिआछिन्न ,
प्राण चेतना को झकझोर हिलाती हैं/

 पन व्यतीत हुए,वर्ष व्यतीत  हुए ,
व्यतीत हुआ शोक विषादों का चक्रवात /
कितनी आयी होंगी जीवन में आंधियां,
कितने  व्यतीत हुए भीषण झंझावत/

पर न कोई शेष चिह्न था ऐसा ,
उन स्वर्णिम पलों की स्मृति जैसा /
वो तरुणाई प्रभात का अरुणोदय थी,
मुकुलों के संग मुकुलित किसलय थी/

कुछ स्मृतियाँ शेष होंगीं,
उन्हें भी जीवन के बीते पल की/
कुछ तीक्ष्ण चुभन होगी,
उनके उर में भी उस पल की/

शेष होंगीं कुछ जीवन की आशें,
अस्थिपंजर में रुकी होंगीं सांसें/
निज कानन में वे भी होंगें व्याकुल,
स्मृतियों से वे भी हुए होंगें आकुल/

नव प्रभात का समय नव्य था,
समीप ही सरोवर के/
हो रहा था विहगों का कलरव,
निकट ही तरुवर के/

पी कहाँ! पी कहाँ! पपीहा बोल रहा था,
कोकिल का कलरव गूँज रहा था /
अम्बुज निज यौवन में डोल रहा था ,
मन मृदुल-मंजुल-झूम रहा था /

यौवन कीमदिरा में अत्क झूम रहा था,
क्षितिज पर अत्न धरा को चूम रहा था /
पुहपों से ले सुगंध समीर भ रहा था,
ऋतुराज से कुछ श्रृंगार भी ख रहा था /

दैदीप्य मान था उसका आनन्, 
निर्झर झरते थे सघन वन में/
आशा की मानो आदि जननी,
सुषमा  संवर रही थी कानन में /

प्रकृति सुषमा बैठी सजधज कर युऊँ,
रजनी ने वसुधा का श्रृंगार किया हो:
जीवन भर का नंन्दन संवरता वहाँ,
अलसाई कोपलों ने मनुहार किया हो/

नंन्दन कानन में  कुछ पुहुप खिले थे,
पौधों पर अधखिली कलियाँ भी थीं/
उन पर भ्रमर करते थे नित गुंजन,
मकरंद पान हेतु कुछ तितलियाँ भी थीं/

समीर भी प्रकृति की वीणा को ,
रह-रह कर झंकृत कर रहा था/
मृगांक भी निज ज्योत्स्ना से,
धरा को अलंकृत कर रहा था/

अलकों की विवृत्ति में उलझ रहा था;
तृष्णा की तपिश में झुलस रहा था/
पथ से हो भ्रमित मैं लक्ष्य हीं था ;
दयनीय था मैं अति क्षम्य दीन था/

सौन्दर्य श्रृंगार की परिभाषा से अनिभिग्य;
था मैं मात्र स्नेह पात्र अतिगव अविग्य/
अलिम्क सदृश्य मैं प्राग का रागी था;
उनके ही अनुरंजन का मैं अनुरागी था/

जीवन के कुछ पल मैंने भी
उनके आंचल में व्यतीत किये थे/
उनके आलिंगन के बंधन,
तरुन्लता  को आश्रय प्रतीत हुए थे/

नित नव नूतन कल्पनाएँ,
बनती संवरती रहती थीं/
जीवन की स्वप्निल आशाएं ,
नित नव उमंगें भरती थीं/

मानस  पटल पर सुंदर-सुंदर
प्रतिबिम्ब उभरते जाते थे/
क्षण प्रति क्षण एक-एक स्वप्न,
त्रण-त्रण हो, बिखरते जाते 









1 टिप्पणी:

  1. स्मृति व्यतीत की जीवन को,
    कर देती है जब विकल /
    अंतस के गह्वर तम से ,
    विह्वल होता उर सकल /

    वाह! सुन्दर सृजन!

    उत्तर देंहटाएं

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