गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

प्रलय और सृजन

एक नीड़ उजड़ा फिर से,
झंझा के भीषण प्रभंजन में,
 प्रलय की परिभाषा
पुनह दोहराई गयी.
एक संकीर्ण सभ्यता में
जीवन मृत्यु से लड़ा!
विजय फिर से
छीन कर लाई गयी ;

फिर-फिर बवंडर उठे,
प्रभंजन के प्रवाह में
सहस्रों नीड़ उजड़ गये,
सभ्यताएं खड़ी की गईं;
सृजन की नीवं डालकर,
रचना गढ़ी गयी

कितनी बार उजड़ेंगे,
इस वीभत्स विध्वंस से ;
हम बार-बार लड़ेंगे ,
प्रलय के चक्रवात
चलते रहेंगें
हर बार वही लड़ाई
लड़ी गयी

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