शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

व्यथा !

दोस्तों मेरे हालत और गम न पूँछो;
कैसा है हाल अब न ये सनम पूँछो!

बारूद से जोड़ा है इमारत का हर पत्थर,
बैठा हूँ किस ऐटम पे ,ये  बम न पूँछो!!

सिसकियाँ हैं जो दिल में ही सिसक रहीं;
सब पूँछो मगर दास्ताँ -ए- सितम न पूँछो!

दहल उठेगी ये दुनिया तुम्हारी, यारों!
चुप रहो, खुद के दिए हुए जख्म न पूँछो!

मेरे अपनों ने किया है जो ए हश्र आज,
कैसे हुआ वीरान मेरा ये चमन न पूँछो!!

कहते हैं लोग मुझे, ये मेरा देश है ,अरे!
होता है क्या, लोगों से ये "वतन" न पूँछो

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