रविवार, 2 सितंबर 2012

सृजन


चाहे जितनी तीव्र चलें ये आंधियां;
उखाड़ सकती है तरु और विटप,
नहीं मोड़ सकती राह सृजन की!

चाहे जितने आयें तीव्र बवंडर;
मिटा सकते हैं बलूकाकृतियाँ,
नहीं मिटा सकते भावना अर्जन की !

चाहे कितने  ही जोड़ लो तुम
अध्याय इतिहास में प्रलय के,
फैला लो सारी वृत्तियाँ वर्जन की!

चाहे कैसे भी बना लो तुम;
नये-नए तरीके नित विलय के,
नहीं रोक सकते राह सृजन की !!

1 टिप्पणी:

  1. आपका ब्लॉग पसंद आया....इस उम्मीद में की आगे भी ऐसे ही रचनाये पड़ने को मिलेंगी......आपको फॉलो कर रहा हूँ |

    कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-
    http://sanjaybhaskar.blogspot.in/

    उत्तर देंहटाएं

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