मंगलवार, 11 सितंबर 2012

अंत हीन यात्रा

घिसटते हुए
पैरों में पड़े छाले;
और अंत हीन 
ये उलझे हुए रास्ते!
थकी हुयी जिन्दगी
और बोझिल सांसें,
नहीं थकती तो 
जिजीविषा और
न खत्म होने वाली 
चिर आकांक्षा !
सभी गतिमान हैं 
अनंत की ओर
अनंत काल के लिए !
अंत हीन यात्रा पर !

9 टिप्‍पणियां:

  1. नहीं थकती तो जिजीविषा .... यह कविता एक गंभीर चिंतन है .

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  2. धीरेन्द्र भाई
    इस गम्भीर कविता को पढ़ कर समझना मेरे बस में नहीं
    इसे साथ ला जा रहीं हूँ नई-पुरानी हलचल में
    मिल-बैठ कर पढ़ेंगे सभी इसी शनिवार 15-9 को
    आप भी आइये न... अपनी पूर्व परिचित नई-पुरानी हलचल में
    इसी शनिवार 15-9 को
    सादर
    यशोदा

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  3. जिजीविषा ही नहीं थकनी चाहिए ..... सुंदर अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  4. यह जिजीविषा ही तो उसकी शक्ति है ...सुन्दर और गहन !

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  5. अच्छी रचना !
    वो मंज़िल क्या..जिसे पाने को..
    पैरों के छाले फूटे ना....

    उत्तर देंहटाएं
  6. इस यात्रा को यूं चलते ही रहना है,जीवन की यही नियति है।


    सादर

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  7. सच, हम सभी अनंत यात्रा के यात्री हैं

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  8. एकदम आध्यात्मिक । अनंत की और अनंत यात्रा के साथी ।

    उत्तर देंहटाएं

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