शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

दफन रहने दो गुजरे कल को..........






दफन रहने दो गुजरे कल को;
भरने में जख्म एक जमाना लगता है !

सुनते-सुनते एक मुद्दत हुयी,
उसका नाम तो अब एक फसाना लगता है!
अरसे बाद जो आईना देखा,
खुद का ही चेहरा अब अनजाना लगता है!

चंद सांसों का लिहाज़ भर है,
मौत का आना भी एक बहाना लगता है! 

दफन रहने दो गुजरे कल को;
भरने में जख्म एक जमाना लगता है !

5 टिप्‍पणियां:

  1. मन को छूते शब्‍द ... बेहतरीन प्रस्‍तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत खूब .... सही है जख्म भरने में न जाने कितना समय लग जाता है

    उत्तर देंहटाएं

  3. सुन्दर शेली सुन्दर भावनाए क्या कहे शब्द नही है तारीफ के लिए....!!!

    उत्तर देंहटाएं

अन्य पठनीय रचनाएँ!

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...