रविवार, 16 सितंबर 2012

नया सवेरा !


आज
सूरज फिर आया
तुम्हारे दरवाजे पर;
एक नया सवेरा लेकर!

दूर कर
निराशा की तमीशा;
उपजाओ आशा!
कैसी चिंता,
बीते कल की;
बीत गया वह क्षण;
गुजर गया तम विवर !
आज
सूरज फिर आया
तुम्हारे दरवाजे पर;
एक नया सवेरा लेकर!

हो चिन्तन;
न हो चिंता जीवन की!
तज दो निज व्यथा का व्योमोहन!
धृ दो पग अब
कर्म पथ पर!
आज
सूरज फिर आया
तुम्हारे दरवाजे पर;
एक नया सवेरा लेकर!

व्यर्थ भ्रम उर में भर, 
विचलित करते 
तुम्हे शून्य- शिखर!
होकर उर्जस्वित,
प्रत्यक्ष का वरण कर 
आज
सूरज फिर आया
तुम्हारे दरवाजे पर;
एक नया सवेरा लेकर! 

3 टिप्‍पणियां:

  1. .सूरज यही तो कहता है , नदियाँ भी यही कही हैं ... भुत सुंदर

    उत्तर देंहटाएं
  2. हो चिंतन
    न हो चिंता जीवन की
    सुंदर अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं

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