गुरुवार, 13 सितंबर 2012

अंत हीन यात्रा-२

हर वो रास्ता 
जिस पर कदम
बढ़ाता हूँ ;
आगे ही वह 
बढ़ जाता है !

सुबह से चलकर 
सूरज शाम तक थक कर 
क्षितिज के पार
ओझल हो जाता है!!

रात के साये में 
खिसकते-खिसकते चाँद भी,
यात्रा में असमर्थ हो जाता है!!

पर मेरी आकांक्षा
लक्ष्य-पूर्व विराम
नही लेने देतीं!
और मैं बस चलता ही जाता हूँ !

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