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विभ्रम

स्वप्न लोक से आकर तुम;
मेरी सुप्त तृषा जगा जाते हो!
स्मृति से तुम हृद तंत्री के;
आछिन्न तार बजा जाते हो!!

कर प्रखर व्यतीत क्षणों से,
सोती बेसुध पीड़ा को !
शून्य हृदय को कर स्वर प्लावित;
कर प्रखर वेदन क्रीडा को !

जीवन संशय के विस्मय से;
क्षण-क्षण होता व्योमोहित !
पथ पर पग देते ही स्मृति,
कर देती अंतस को व्यथित !

द्युति आछिन्न हुए सब;
नक्षत्र गण भी निबड़े तम में!
नहीं प्रतिभास दीखता ,
है अब जीवन के सरगम में!

हर क्षण डसने को तैयार खड़ी,
श्वास -श्वास पर काल व्याली!
विवृत है तम का अवगुंठन यहाँ;
ज्यों प्रलय काल की निशा काली!

नहीं बजती अब जीवन में;
सप्त स्वरों की राग लहरी !
कर्म कृपाण हुयी गति मंद,
अनिश्चित वेदना सी ठहरी !

अतीत का उपालम्भ कैसा,
त्यक्त कर व्यर्थ चिन्तन !
भ्रम से न बन अपभ्रंश तू;
यह सब है प्रत्यक्ष मंथन !

व्यर्थ भ्रम है जीवन-मरण,
कर तू निज पथ कर्म वरण!
बना स्यन्दन यह मानव तन 
हो पूर्ण लक्ष्य पथ संवरण !

टिप्पणियाँ

  1. बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको
    और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

    http://madan-saxena.blogspot.in/
    http://mmsaxena.blogspot.in/
    http://madanmohansaxena.blogspot.in/

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  2. सुन्दर....
    अद्भुत शब्द संयोजन....

    अनु

    उत्तर देंहटाएं

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

इंतजार, इंतजार करो

तुम्हें याद होगा!
नीली रोशनी में
काँपते हुए  
नीले होंठों से कहा था-
"--------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
सावन की हल्की  फुहारों में
सकुचाते ह्रदय से कहा था- 
"------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
अंगीठी के पास
लाल सुर्ख चेहरे  से 
शर्माते हुए कहा था- 
"----------------!" 

और यह कहती हुई 
मुझे तनहाई में  
सन्नाटे देकर चली गयी- 
" इंतजार, इंतजार करो ! "