गुरुवार, 20 सितंबर 2012

होना कत्ल-ए-आम है!


लोग यूँ ही अंगुलियाँ नही उठाते ;
तेरे चर्चों  में मेरा भी नाम है!

एक  तेरा ही मुजरिम रहा मैं,
जमाना तो बेवजह बदनाम है!

गुनाह खुद ही कर बैठे थे खुद से,
ये तो फैला हुआ तेरा ही दाम है!

कबूल है हर एक सजा भी अब,
बचना क्या- होना कत्ल-ए-आम है!

5 टिप्‍पणियां:

  1. भाव्पूत्न रचना है "एक तेरा ही मुजरिम रहा मैं
    ज़माना तो बेवजह बदनाम है "सुन्दर पंक्ति |
    आशा

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  2. कल 21/09/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं

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