गुरुवार, 13 सितंबर 2012

बहुत दिनों के बाद,



बहुत दिनों के बाद,
आज मेरे भी आंगन में 
धूप खिली है!

फैला था कुहरा 
अति घनघोर,
था चतुर्दिश 
शीत लहर का शोर ,
कुहासे के छटने पर ,
सूरज ने ऑंखें खोली है ....
बहुत दिनों के बाद ,
आज मेरे भी आंगन में 
धूप खिली है!


शिशिर रातों के 
हिम पाटों में 
शीत से व्याकुल हो, 
तप-तप टपकती 
जल की बूंदों से 
निशा में आकुल हो;
हमसे आज करती 
प्रकृति भी यूँ कुछ 
ठिठोली है............

बहुत दिनों के बाद ,
आज मेरे भी आंगन में 
धूप खिली है!

देख कर जलद
उड़ते गगन में
आम्र कुंजों में मग्न हो,
नाच उठे मयूरी !
सितारों जड़ी ओधनी 
ओढ़ के धरा पर 
आयी  हो शाम सिंदूरी !
मानो शृंगारित  हो 
नव वधू प्रिय मिलन को चली है!

बहुत दिनों के बाद ,
आज मेरे भी आंगन में 
धूप खिली है!

पौधों पर नव कलियाँ 
खिल-खिल कर झूम रही ,
सरसों की अमराई में
तितलियाँ फूलों को चूम रही;
मानो प्रकृति ने आज धरा पर 
पीली चूनर डाली है!

बहुत दिनों के बाद ,
आज मेरे भी आंगन में 
धूप खिली है!

नभ में गूँज रहा
विहगों का कलरव, 
खिला हुवा अम्बुज है 
ज्यूं सरिता का कुल गौरव ;
निज योवन कि अंगड़ाई  में
निस्त्रा भी मचली है!

बहुत दिनों के बाद ,
आज मेरे भी आंगन में 
धूप खिली है!

3 टिप्‍पणियां:

  1. आँगन में उतरती धूप का बेहद सुन्दर शब्दों से स्वागत किया है आपने ..सादर

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  2. वाह बहुत खूबसूरत अहसास हर लफ्ज़ में आपने भावों की बहुत गहरी अभिव्यक्ति देने का प्रयास किया है... बधाई आपको... सादर वन्दे...superb .

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