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क्यूं हुआ मेरा जन्म!



क्यूं हुआ मेरा जन्म ,
क्या था मेरा अभिशाप,
किस कर्म फल का यह प्रायश्चित ,
जिसे मैं घुट-घुट कर ,
मर-मर कर जी रही हूँ ??


घर -बाहर हर जगह ,
यह महा विभेद!
'नारी उत्थान '
अधिकारों की समानता ,
कितना मृदु -तीक्ष्ण व्यंग्य ,
नारी के द्वारा ही ,
नारी को अभिशापित
करने की क्रूर प्रथा!!


धन्य है वह (नारी)
जिसे मार दिया गया,
जन्म से पहले ही ,
जिसे उबार दिया गया !


रचा गया फिर एक
नया सिद्धांत
भ्रूण हत्या को ,
संवैधानिक पाप
करार दिया गया !


वाह ऱी सभ्यता!
तू और मैं
दोनों में कितनी समानता है ?
दोनों की हत्याएं
हो रही हैं ,
और मूक होकर
हम रो रही हैं ,
क्योंकि हमारा "जेंडर"
एक ही तो है!

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक
हमको हमारा ये चराग मुबारक।

तुम क्या मुकम्मल करोगे मसलों को,
तुम्हें ही तुम्हारा जवाब मुबारक।

हो सकते थे और बेहतर हालात,
रख लो, तुम्हें तुम्हारा हिसाब मुबारक ।

सूरत बदलने से नहीं बदलती सीरत,
तुमको ये तुम्हारा नया हिजाब मुबारक।

खुद ही खुद तुम खुदा बन बैठे हो
तुम्हें यह तुम्हारा खिताब मुबारक।

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक
हमको हमारा ये चराग मुबारक।