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अस्तित्व

थक चुकी है 
अब धरती;
जीवन का भार ढोते -ढोते!
बिखर जाना चाहती है 
टूट कर, होना चाहती है विलीन 
आकाश गंगा में;
पुनः अपने अस्तित्व के लिए!
बस प्रतीक्षा है 
इसको उस "asteroid" का 
जो अनंत से आ रहा है
लिए एक विनाश 
और पुनर्निर्माण के 
प्रारम्भ का नया सोपान!
ऐसे ही कितने 
होते रहते है विनाश;
और सृजन की
प्रक्रिया चलती रहती है
अनवरत!
और यह "black hole"
बनता रहता है,
अनंत आकाश गंगाएं !

टिप्पणियाँ

  1. सृजन और नाश ,,,जन्म और मृत्यु की तरह सत्य है

    उत्तर देंहटाएं
  2. उम्दा पंक्तियाँ ..
    भाषा सरल,सहज यह कविता,
    भावाव्यक्ति है अति सुन्दर।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति,,

    प्रकृति में सृजन और बिनाश प्रक्रिया निरंतर चलाती रहती है ,,,,,

    RECENT POST : गीत,

    उत्तर देंहटाएं

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

इंतजार, इंतजार करो

तुम्हें याद होगा!
नीली रोशनी में
काँपते हुए  
नीले होंठों से कहा था-
"--------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
सावन की हल्की  फुहारों में
सकुचाते ह्रदय से कहा था- 
"------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
अंगीठी के पास
लाल सुर्ख चेहरे  से 
शर्माते हुए कहा था- 
"----------------!" 

और यह कहती हुई 
मुझे तनहाई में  
सन्नाटे देकर चली गयी- 
" इंतजार, इंतजार करो ! "