शनिवार, 22 सितंबर 2012

टूटा जो ख़्वाब इकरार करते-करते

एक मुद्दत से प्यासी थीं नजरें,
रात गुज़र गयी दीदार करते-करते!

लफ्ज़ मचलते ही रहे लबों पे;
टूट गयी सब्र इजहार करते-करते!

शब- ए- फुरकत में सिमट गये लम्हे;
उभरे जो ज़ख्म ऐतबार करते-करते!

रूह से इक आह सी निकल गयी;
टूटा जो ख़्वाब इकरार करते-करते!

एक मुद्दत से प्यासी थीं नजरें,
रात गुज़र गयी दीदार करते-करते!

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