सोमवार, 17 सितंबर 2012

परिवर्तन

चिड़िया के चूजे जब
चहचहाते  थे उनदिनों पेड़ पर;
कोई गोरैया चुन लेती थी
अपने हिस्से के चावल!
और तिलोरियों की लड़ाईयां 
देती थीं संकेत बारिश आने का!
पुराना बरगद जो 
हुआ करता था
अनगिनत पक्षियों का बसेरा!
अब चिह्न भी नहीं रह गये 
अवशेष जो इनके होने का 
प्रमाण दे सकें!
हाँ इन पेड़ों की जगह लेली हैं
कुछ सरकारी इमारतों ने !
जहाँ कभी-कभी भीड़ इकट्ठी होती हैं
दाने-दाने की लड़ाईयों के लिए;
जिन पर  सरकार ने पाबंदी लगा दी है 
अब कोई दो दानों से अधिक नहीं खायेगा;
और जिसको खाना होता है
वो बन जाता है खुद सरकार!

9 टिप्‍पणियां:

  1. और जिनको खाना होता है वो बन जाता है सरकार .... सटीक ... अच्छी रचना

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  2. आपस में हम लड़ रहे,करते है तकरार
    गरीबो का हक छीनकर,खा जाती सरकार,,,,

    पोस्ट पर आने के लिये आभार,,,,,
    आप समर्थक बने तो हार्दिक खुशी होगी,,,,,
    RECENT P0ST फिर मिलने का

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  3. विकास की विनाशलीला का सहजता से प्रतिबिंबन कितना असहज होता है, वह रचनात्मक व्यक्ति ही जान सकता है। कविता भूत और वर्तमान की पगडंडी होती हुई भविष्य के सच तक ले जाती है।

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  4. दाने दाने की लड़ाईयों के जिन पर सरकार ने पाबंदी लगा दी है
    बहूत सुंदर

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  5. जिनको खाना होता है वो बन जाता है सरकार .... सटीक ... अच्छी रचना दाने दाने पर पर लिखा है खाने बाले का नाम

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  6. रचना बहुत अच्छी लगी | सुन्दर कटाक्ष

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