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परिवर्तन

चिड़िया के चूजे जब
चहचहाते  थे उनदिनों पेड़ पर;
कोई गोरैया चुन लेती थी
अपने हिस्से के चावल!
और तिलोरियों की लड़ाईयां 
देती थीं संकेत बारिश आने का!
पुराना बरगद जो 
हुआ करता था
अनगिनत पक्षियों का बसेरा!
अब चिह्न भी नहीं रह गये 
अवशेष जो इनके होने का 
प्रमाण दे सकें!
हाँ इन पेड़ों की जगह लेली हैं
कुछ सरकारी इमारतों ने !
जहाँ कभी-कभी भीड़ इकट्ठी होती हैं
दाने-दाने की लड़ाईयों के लिए;
जिन पर  सरकार ने पाबंदी लगा दी है 
अब कोई दो दानों से अधिक नहीं खायेगा;
और जिसको खाना होता है
वो बन जाता है खुद सरकार!

टिप्पणियाँ

  1. और जिनको खाना होता है वो बन जाता है सरकार .... सटीक ... अच्छी रचना

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  2. आपस में हम लड़ रहे,करते है तकरार
    गरीबो का हक छीनकर,खा जाती सरकार,,,,

    पोस्ट पर आने के लिये आभार,,,,,
    आप समर्थक बने तो हार्दिक खुशी होगी,,,,,
    RECENT P0ST फिर मिलने का

    उत्तर देंहटाएं
  3. विकास की विनाशलीला का सहजता से प्रतिबिंबन कितना असहज होता है, वह रचनात्मक व्यक्ति ही जान सकता है। कविता भूत और वर्तमान की पगडंडी होती हुई भविष्य के सच तक ले जाती है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. दाने दाने की लड़ाईयों के जिन पर सरकार ने पाबंदी लगा दी है
    बहूत सुंदर

    उत्तर देंहटाएं
  5. जिनको खाना होता है वो बन जाता है सरकार .... सटीक ... अच्छी रचना दाने दाने पर पर लिखा है खाने बाले का नाम

    उत्तर देंहटाएं
  6. रचना बहुत अच्छी लगी | सुन्दर कटाक्ष

    उत्तर देंहटाएं

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

इंतजार, इंतजार करो

तुम्हें याद होगा!
नीली रोशनी में
काँपते हुए  
नीले होंठों से कहा था-
"--------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
सावन की हल्की  फुहारों में
सकुचाते ह्रदय से कहा था- 
"------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
अंगीठी के पास
लाल सुर्ख चेहरे  से 
शर्माते हुए कहा था- 
"----------------!" 

और यह कहती हुई 
मुझे तनहाई में  
सन्नाटे देकर चली गयी- 
" इंतजार, इंतजार करो ! "