शनिवार, 7 जनवरी 2012

अपनी ही दास्ताँ

 कोई भूल जाता है
अपनों को 
कोई अपना लेता है 
सपनो को ,

किसी को दर्द में
मिलती  ख़ुशी, 
कोई  ढूढ़ रहा 
ग़मों में हंसी ,

कोई रो रहा है 
अपने ही हाल पे ;
नाच रहा कोई
दूसरे की ताल पे,

सब अपनी ही 
कहानी बुने जा रहें ,
अपनी ही दास्ताँ 
खुद ही सुने जा रहें !

दस्तूर है इस जहाँ का 
किसी का कोई 
सहारा नहीं होता;

डूबती कश्ती का और 
आती -जाती मौजों  का 
किनारा नहीं होता !

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