सोमवार, 23 जनवरी 2012

आज मेरा भारत अपनी ही दुर्दशा पर रो रहा है !

आज मेरा भारत
 अपनी ही दुर्दशा 
पर रो रहा है ,

हर तरफ अत्याचार, 
फ़ैल रहा भृष्टाचार,
रो रही मानवता ,
 हो रहा दुराचार 
 देख कर निज सुतो का 
निज पर व्यभिचार !
विवश हो रहा है ! 
आज मेरा भारत
 अपनी ही दुर्दशा
पर रो रहा है !

हाय मानव की पिपासा,
जागृत क्षुधा
अभिशिप्त अभिलाषा ,
यह कलुषित समाज,
हो रहा कैसा  द्वंद्व आज !
सुभाष ,भगत आजाद,
कैसे होगा सहन यह
निज बांधवों का अवसाद !
अमित अस्तित्व क्यों
आज खो रहा है ?

आज मेरा भारत
 अपनी ही दुर्दशा
पर रो रहा है !

गीता का दर्शन ;
पन्ना का त्याग,
हल्दी घाटी का मैदान,
जलियाँ वाला बाग़ !
राणा की धरती ,
पदमनियों का सुहाग !
आज क्रांति की हर
वो सर्जक आग ,
सब यह व्यर्थ
क्यों हो रहा है?

आज मेरा भारत
 अपनी ही दुर्दशा
पर रो रहा है !


1 टिप्पणी:

  1. भारत के आंसू पहचानती है कवि की लेखनी...
    परिदृश्य अवश्य बदलेगा!

    उत्तर देंहटाएं

अन्य पठनीय रचनाएँ!

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...