शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

अंत हीन निशा !

बीते बरस ऐसे ,
मानो कल की बात हो !
रीता जीवन जैसे
अमावस की रात हो !

दिन भर बाद ,
उन शामों का ढलना,
दिल में अधूरी
आशाओं का मचलना,
सोंच कर मन में
 बिछलन  की बातें ;
सांसों का रुक जाना,
दिल का दहलना !

उनका मेरे जीवन से जाना ;
जैसे कोई अधूरी बात हो!

रीता जीवन जैसे
अमावस की रात हो !

कुछ कहना और कुछ सुनना,
मन ही मन कुछ -कुछ बुनना,
चुनना सपने, सपने गुनना !
सपने- अपने सब भूल गये;
रह गया बस सांसों का चलना!

कहाँ खो गयी ऊषा की आशा;
जैसे अब ये अंत हीन रात हो !
रीता जीवन जैसे
अमावस की रात हो !



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