बुधवार, 11 जनवरी 2012

अभिलाषा !!


सागर तट की
वह ऊष्ण रेत,
जिसकी आद्रता
क्षणिक थी,

जीवन के वो पल
जो गुजरे थे,
कभी उस रेत पर ,

रेत तब से
अब तक वैसी ही है;
पर वे क्षण ,
अभी भी आँखों को
गीला कर जाते हैं!

आज मैं
भटकता हुआ
पहुँच गया
उसी रेत की
तलाश में

वे कुछ कण
जो बदन से
 लिपटने के बाद
फिर बिछुड़ गए,
वहीँ कहीं पर!

शायद
कहीं कोई रेत
का कण आज भी
उन क्षणों की
प्रतीक्षा में !
ठहरे थे ,

पर अभागा
वह और मैं
आज भी
कर रहे हैं
फिर से वाही
अभिलाषा !!

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