मंगलवार, 3 जनवरी 2012

'चेतना'

चेतना
लुप्त हो गयी
आज इस समाज की;
ठीक उसी प्रकार
लुप्त  प्राय प्रजातियों की तरह !

चेतना
अब चेतन  से
बिलग हो
जडवत हो गयी!

सहसा
चौक किसी घटना से,
झकझोर उठता जब
अचेतन सा यह हृदय!

किंचित
परिवर्तित हो जाती गति;
पर चेतना का
दम घुट सा जाता!

एक तीव्र हलचल
व्याप्त हो जाती
इस समाज में;
सुसुप्त प्राय चेतना
लुप्त हो जाती !

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