शनिवार, 21 जनवरी 2012

बेचारा भारत का किसान!

जीवन भर तरसते हुए ,
लोगों का पेट भरता रहा!
कभी गाली, कभी उलाहना
खामोश रह कर  सहता रहा !

सारे जहाँ का गम
अपना समझा ,
पर यहाँ निकम्मा ही
 कहलाता रहा
गर्मी का तपता सूरज हो
 या हो  दिसम्बर का
 कपकपाता जाड़ा,
न मौसम का गिला दिया
अपना फर्ज समझ कर कर्ज
 निभाता रहा !

रुका न कभी साँस रुकने तक
पेट के लिए धरती की छाती को
चीरकर , अन्न उगाता रहा !
खाने को भोजन  और
पीने के पानी हेतु
हमेशा लड़ता रहा !
और
क्या मिला ये बताकर मैं
खुद को क्यों
जिन्दा जलाता रहा !


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