शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

ये प्राण बड़े ही निठुर और नीरस हैं !

ये प्राण बड़े ही 
निठुर और नीरस हैं !
किस पर इन्हें
समर्पित किया जाय !


कब छोड़ चले जाएँ 
इन माटी के मटके 
से बिन पर उड़ जाएँ !

कर लो कुछ ऐसा 
जो ये क्षुण  जीवन 
बन सार्थक जाय !

अर्थ निरर्थक है 
सब कृतिका में !
मृग मरीचिका के 
तृषा जाल से 
समय पूर्व बच जाय;

सब रंग बेरंग हैं ,
जीवन दर्शन नहीं 
साश्वत और सत्य है 
लेकिन जिया जाय !


हर मृत्यु करती 
सुप्त को जागृत ,पर
हर समय स्वयं 
होता भ्रमित 
क्या मेरा भी होगा अंत 
इसे भी जान लिया जाय !

ये प्राण बड़े ही
निठुर और नीरस हैं !
किस पर इन्हें
समर्पित किया जाय !

  

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