गुरुवार, 5 जनवरी 2012

"साँझ का दीपक'

साँझ ढलने पर;
जब दिया
जलाती हूँ ,

रहता है मुझे भी
इन्तजार
उस उजाले का ;

जो मिटा दे मेरे
जीवन का
सारा अँधेरा ;

पर हर रात
भारी पड़ जाती है
इस दीपक पर '

सोंचती हूँ
क्यों आता है
प्रभात हर बार;

फिर छोड़ जाता है,
वही निबडी
तमिसा मयी रात!

शोर के साये में
कट जाते हैं
थके हुए दिन ,

पर सन्नाटे में
बोझिल रातें
कैसे काटी जायं!

हर शाम वही
अँधेरा और
विरोध करता दीपक !

दोनों अपनी जगह
तटस्थ , इन्तजार
और ये रातें !

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