शनिवार, 21 जनवरी 2012

नसीब

संवर जाता ये मुकद्दर मेरा ,
जो तुम मेरे नसीब में होते!

खुद को बहुत सम्भाला मैनें ,
न जाने क्यों मैं संभल न  पाया?
हर कोशिश नाकाम हो गयी;
कोई भी मुझको समझ न पाया!
दिया होता लबों ने साथ मेरा,
ये जलवे मेरे नसीब में होते ;

संवर जाता ये मुकद्दर मेरा ,
जो तुम मेरे नसीब में होते!

करता हूँ कोशिशें भुलाने की ,
हर कोशिश पे याद आ जाते हो!
आंसू बन कर तुम आँखों में,
हर तन्हाई के बाद आ जाते हो 
होते न ये आंसू और तन्हाई 
जो तुम मेरे करीब में होते 

संवर जाता ये मुकद्दर मेरा ,
जो तुम मेरे नसीब में होते!

मैं हूँ, तो किसलिए जिन्दा अब;
किस खता की ये सजा पा रहा हूँ ;
न तो कोई जीने का सहारा है,
किस उम्मीद पे जिए जा जा रहा हूँ ?
हर लम्हा मुस्कुरा के जी लेता 
जो तेरे गम मेरे नसीब में होते!

संवर जाता ये मुकद्दर मेरा ,
जो तुम मेरे नसीब में होते!




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