गुरुवार, 5 जनवरी 2012

कविता और कहानी के आधुनिक कलेवर पर लोगों की राय !


मोहन श्रोत्रिय 
यह देखने पर "ज़ोर" कम क्यों हो गया है, इन दिनों, कि कहानी में कितना "कहानीपन" बचा है? और 
कविता में कितनी "कविताई"? और इन दोनों में बोलना 
हमारे समय का? कहीं यह उत्तर-आधुनिकता का असर/लक्षण ही तो नहीं कि कविता-कहानी में मूल 
अंतर्वस्तु के सिवाय बहुत कुछ दिख जाता है? कि समय 
शिल्प में बोलता है या कथ्य में? कि शिल्प यदि अलग से बोलता है रचना में, तो वह रचना की ताक़त हो 
सकता है क्या


इस अनुच्छेद पर हुयी चर्चा के अंश :


प्रेम चंद गाँधी : सर, आप बिल्कुल सही कह रहे हैं। इधर शिल् पर कुछ ज्यादा ही जोर है और सच में 
यह हमारे समय की उत्तर आधुनिक ट्रेजेडी है। यह 
अलग किस् का रूपवादी समय है, जहां अंतर्वस्तु के बजाय शिल् को पसंद ही नहीं किया जा रहा, बल्कि 
उसे ही मुख् माना-कहा जा रहा है।


धीरेश सैनी : पिछले कुछ बरसों में कुछ अजूबा करने का कंपीटिशन सा रहा। ठानकर लंबी कविताएं-
कहानियां औऱ उनके अजब-गजब शिल्प पर वाहवाही 
की गई लेकिन उनके कथ्य पर जो कई बार बेहद पुनरुत्थानवादी, ब्राह्मणवादी और वंचित समाज विरोधी 
रहा की अनदेखी की गई। बर्र के छत्ते में हाथ डालने के 
डर से अधिकांश लोग चुप रहे, कुछ को बोलने पर गालियां खानी पड़ीं। `अभिव्यक्ति की आज़ादी`जहां 
लेखक पूरी तरह बरी है।


मोहन श्रोत्रिय: चिंता की बात लगी, प्रेम चंद, इसीलिए साझा की. मंशा भी यही रही कि मित्रों की राय आए और कोई व्यापक सहमति बन सके.

प्रेम चंद गाँधी : सर, यहां मैं पहली बार आपको अपनी यही चिंता जो मैंने लंबी कविता 'भाषा का भूगोल' में व्यक् की है, बताना चाहता हूं। ''हर तरफ 

आकृतियां थीं अर्थहीन/अमूर्तन की अनसुलझी पहेलियां थीं/प्रयोगों की भरमार थी ऐसी कि/समाज में जो घट रहा था/उसका अंश तक नहीं था कला में''


धीरेन्द्र अस्थाना : साहित्य की शिल्प रचनात्मकता और कथ्य दोनों ही आज के उत्तर आधुनिकता में उपेक्षित हो रहें हैं , साहित्य कार अपने दायित्त्व से पीछे 
हटते जा रहें हैं , हाँ नवीन प्रयोग होने चाहिए पर नवीनता ग्राह्य और सार्थक हो !साहित्य जब यथार्थ की पृष्ठ भूमि पर लिखा जाय तो शिल्प और कथ्य दोनों 
स्वाभाविक रूप से मिलता है !
मुंशी प्रेम चंद, ताल्स्तॉय, चार्ल्स डिकेन, और वर्ड्सवर्थ महादेवी वर्मा आदि इनके अनगिनत उदहारण हैं !


रितुपर्ना मुद्रा राक्षस : पूर्ण सहमति! बहुत ज़्यादा नहीं जानती हूँ लेकिन मेरा मानना है कि किसी भी रचना का कथ्य-विषय अपने अनुरूप शिल्प का चयन 
स्वयँ करता है... बेवजह शिल्प का जानाबूझा (deliberated) इस्तेमाल रचना को कमजोर ही करता है..

मोहन श्रोत्रिय: तुम्हारी वह कविता अच्छी लगी थी, प्रेम चंद. बस उसका एकाध हिस्सा ऐसा लगा था जैसे जल्दबाज़ी में लिख दिया गया हो, और जो पूरी 
कविता की "टोन" से मेल नहीं खा रहा था. वह कविता तो थी ही, अपने समय की रचनाशीलता की समीक्षा भी.

आकांक्षा  अनन्त  सिंह  मैं समझती हूँ कि लेखन के शास्त्रीय परंपरा से कटा हुआ उत्तर आधुनिक रचनाकार कथ्य शिल्प में संतुलन की स्थापना में खुद 
को अक्षम पा रहे हैं ..... हाल के वर्षों में अनुवादित कविताओं/कहानियों की भरमार ने भी शिल्प के दिशा निर्धारण में एक अलग प्रकार की अराजकता को 
लेखन में प्रतिष्ठित कराया है.. अनुवाद में प्रकट होने वाली कमजोरियों को नए रचनाकारों ने नए प्रकार का शिल्प समझ लिया है ..'मेरी नाक' को 'मेरे होठों के 
ऊपर का उभार' लिखने की परिपाटी जोर पकड़ रही है और इसे सराहा भी जा रहा है..

धीरेन्द्र अस्थाना :किसी भी समय का साहित्य उस समय के समाज का बिम्ब या इतिहास दर्शाता है ,
पर अद्यतन साहित्य भविष्य के समाज को क्या देगा ये तो अभी काल के गर्भ में हैं !
हाँ यह तय है कि इस काल का साहित्य अपनी दिशा और लक्ष्य से भटकाव की ओरजा रहा है !

माधवी पाण्डेय : आप सभी लेखन के क्षेत्र में प्रतिष्ठित व्यक्तित्यों के बीच अपनी अदना सी समझ रख रही हूँ - कविता या कहानी में शिल्प को निभाने के अतिवादी प्रयास में भाव और कथ्य कंही खो जाता है ऐसे में कविता  या कहानी का मूल पीछे छुट जाता है और रचना मात्र 
परिष्कृत/दुरूह शब्दों का संग्रह ही रह जाती है . रचनाधर्मिता के क्षेत्र में नया इतिहास लिखने की होड़ में ही कोई भी रचना अपने समय के यथार्थ से दूर होती जा रही है .


दिगम्बर आशु :सवाल यह है की कथ्य की उपेक्षा कर के शिल्प की कलाबाजियों का ( नाक बेंच कर नथनी खरीदने का ) यह फैशन क्यों बढा? इस के पीछे विचारधारा से, जनोंन्मुखता से, प्रतिवद्धता से, पक्षधरता से पल्ला झाड़ने की घोषित-अघोषित प्रवृति की बड़ी भूमिका रही है.प्रयोगवादी दौर में भी यह रुझान इतने घातक रूप में मौजूद नहीं था.तभी तो शप्तक कवियों के बीच से प्रबल जनपक्षधर कवियों की धारा बह चली थी.

धीरेन्द्र अस्थाना : जब बच्चे को भूख लगती है तो वह माँ से सरल रूप में ही भोजन मांगता है ;
इसी तरह सीधी बात में व्यक्त किया गया साहित्य भी जन मन और समाज को अपना औचित्य बताता है कि मष्तिष्क को उलझाने वाला शब्दाडम्बर से भरा हुआ
क्लिष्ट साहित्य ! तुलसी बाबा की विनयपत्रिका और श्री रामचरित्र मानस इन दोनों विधाओं के सक्षम उदहारण हैं !

अरुण देव : कवि और कातिब में फर्क तो करना होगा..

वंदना शुक्ल : दरअसल लिखना हर कवि के लिए एक आत्म संघर्ष होता है ,|जो रचनाएँ मात्र लेखक का अपना मंतव्य होती हैं इकतरफा ,और अपने पाठक को नज़र अंदाज़ करके लिखी गई हैं ,वो सफल नहीं होतीं |कहानी में एक्टीविज्म होना चाहिए |कहानी हो या कविता ,जीवन के साद्र्श्य और समय के सापेक्ष होनी चाहिए |निर्मल वर्मा के लिए कहा गया ‘’समय उनके यहाँ कभी बीतता नहीं उपस्थित रहता है’’|यही कालजयी साहित्य है |दरअसल उत्तर आधुनिकता वाद एक त्वरित (इंस्टेंट)समय की पैदाइश है यहाँ भोजन से लेकर ख्यति तक में ये अवधारणा प्रतिबिंबित होती दिखाई देती है येन केन प्रकारेण |हिंदी कविता में प्रयोगधर्मी वातावरण इसी अवधारणा का प्रारूप है |विश्व प्रसिद्द लेखकों में कथ्य शिल्प का संयोजन और सामंजस्य उनकी विशेषता है ,जहाँ शब्दों का वेग कथ्य को अतिक्रमित नहीं कर पाता लिहाजा यहाँ शिल्पगत क्रीडा यथार्थवादी तत्व का असंतुलन नहीं |उत्तराधुनिकता में यथार्थ की अपेक्षा प्रायः चमत्कार 
का अंश और शिल्प अधिक महत्वपूर्ण हैं |आज क्लिष्टता को उत्कृष्टता का पर्याय मान लिया गया है,इस सन्दर्भ में शमशेर के एक लेख की पंक्तियाँ याद आती हैं 
‘’
सरलता का आकाश था जैसे त्रिलोचन की कवितायेँ साधारण अभिव्यक्ति में असाधारण अर्थ खुलते हों ,चेखव की कहानियां इसका सशक्त प्रमाण हैं |कहा गया कि ‘’मानवीय संवेदनाओं को बचाना ही कविता का सबसे बड़ा काम है ‘’|केदार नाथ सिंह की एक कविता ‘’मै बरसों से जानता था /एक अधेड़ किसान /थोडा थका,थोडा झुका हुआ /किसी बोझ से नहीं /सिर्फ धरती के उस गुरुत्वाकर्षण से /जिसे वह इतना प्यार करता था /उसकी छोटी सी दुनियां थी /छोटे सपनों और ठीकरों से भरी हुई /उस दुनियां में पुरखे रहते थे /और वे भी जो अभी पैदा नहीं हुए |ऐसी तमाम कवितायेँ हैं जिनकी दरकार किसी खास बौद्धिक पाठक वर्ग की ना होते हुए भी संवेदनाओं के अधिक सन्निकट हैं ,यही साहित्य का उद्देश्य है और यही प्रासंगिकता | विपिन कुमार की कविता में ‘’कविता ‘’का एक बिम्ब प्रस्तुत किया गया है ‘’अब तो जो हाल है कविता में /ठीक एक जैसे शब्द भी रख दूँ /तो वे आपस में टक्कर मारने लगते हैं /शब्दों के बीच भी /आपसी मेल मिलाप और परस्पर सम्मान या रिश्ता /ना बच सका /कविता का ज़रा लिहाज़ भी नहीं /पास आते ही मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं .....|’’कहानी में यथार्थ के प्रति एक खास किस्म की निषेध वादी द्रष्टि से फंतासियों ,प्रतीकों,संकेतों से भरे असंबद्ध ,निरर्थक ब्योरों से लदी फदी कहानियों को आधार बनाकर युवा रचना शीलता को कहानी के विकास के एक खास आयाम के रूप में देखना एक एतिहासिक भूल होगी ‘’|’’रवीन्द्र कालियाइस सर्द अँधेरी सुबह में तेज़ी से दूर जाती वह चीख मुझे दुनियां छोड़ रही किसी आत्मा की आह जैसी लगी ‘’...मोपांसा
‘’
सूरज की टटकी किरणों सी आभा में लाल ताजा फूलों से लादे जंगल पलाश दाहक उठे ,मानो जंगल में आग लग गई हो ‘’’’’(निर्मल वर्मा )
कहानी में उपरोक्त दो विख्यात कथाकारों के उदाहरण में शिल्प ,यथार्थ को अतिक्रमित ना करते हुए कहानी का मार्ग प्रशस्त करता है |

मोहन श्रोत्रिय: यह 'कातिब' कहां से गया? ऊपर कही किस बात से यह ध्वनि निकली, खुलासा कर दें तो सहूलियत रहे.

धीरेन्द्र अस्थाना: प्रशाद जी द्वारा रचित रचनाएँ वंदनाजी के तर्क कोबल देतीं हैं जोकि शिल्प और कथ्य दोनों पक्षों का निर्वहन सार्थकता से करतीं हैं !

अरुण देव : लेखक की कलात्मक संवेदना से ही उसकी सामाजिक संवेदनशीलता की खोज़ होनी चाहिए. कला के विशिष्ट स्वरूप की पहचान करते हुए उसके सामाजिक अभिप्राय की खोज़ होनी चाहिए !रचना के सिर्फ अंतर्वस्तु की विवेचना अक्सर समाजशास्त्रीयता का शिकार हो जाती है.

मोहन श्रोत्रिय: कविता बिंबों की सामर्थ्य दिखाने के लिए या बिंब कविता को असरदार बनाने के लिए?


अरुण देव : दरअसल यह ग्राम्सी का बड़ा ही मशहूर वाक्य है-"दो लेखक एक ही सामाजिक ऐतहासिक वास्तविकता को अभिव्यक्त करते हैं लेकिन उसमें से एक कलाकार होता है और दूसरा केवल कातिब "बिम्बो में भी असरदार कविता होती है जहां तक उत्तर आधुनिकता का सवाल है ..उत्तर का बड़ा नजदीकी रिश्ता अन्त से है. उत्तर आधुनिक्तावादिओं ने लगभग हर चीज के अन्त की घोषणा कर रखी है ज़ाहिर है कविता की भी. पर अब जहां से वह पैदा हुई है खुद वहाँ भी उसका अन्त हो गया है.

आकांक्षा अनंत सिंह : शिल्प और कथ्य की अपनी अलग अलग शक्ति और सामर्थ्य पर बहस नहीं किया जा सकता..सचमुच केवल बिम्बों में गुंथी एक कविता अद्भुत हो सकती है तो केवल कथ्य में व्यक्त एक जनबासी सर्वोपरि रचना.. मुझे लगता है कि कविता/कहानी को लम्बे समय तक जिंदा बनाये रखने का सवाल रचनाकार की मुख्य चिंता होनी चाहिए.. कालजयी लोकोक्तियाँ इसका उदाहरण मानी जायें जो शब्दों में तो कमतर होती हैं पर कभी शिल्प की वजह से तो कभी कथ्य के सहारे लगातार प्रयोग में बनी रही हैं 

मोहन श्रोत्रिय: पर अरुण जी, मेरी बात का तो उत्तर नहीं मिला. कातिब के सवाल पर. जिन्होंने हर चीज़ का अंत घोषित कर दिया, यहां बात उनकी उतनी नहीं जितनी उनकी कि जो कदाचित उस अंत को वास्तविक मानकर एक नई शुरुआत कर रहे हैं.

अरुण देव : दिन - भर की तपिश के बाद
                 
ताज़ा पिसा हुआ गरम-गरम आटा
                 
एक बूढ़े आदमी के कंधे पर बैठकर
               
लौट रहा है घर............... (केदारनाथ सिंह)
    
बिम्ब है या कविता

मोहन श्रोत्रिय: और खुद वहां ही 'अंत' का अंत हो गया है, तो 'विचार' और 'यथार्थ' के अंत का अंत भी हो ही गया होगा, तब तो स्टेटस में उठाए गए सवालों के उत्तर खोजना और भी ज़रूरी हो जाता है, अरुणजी.

अरुण देव : कथ्य और तथ्य पर ज़ोर कातिब का होता है. कलाकार भाव और शिल्प को पकड़ता है.


आकांक्षा अनंत सिंह : ये मारा निचोड़ अरुण जी ने..... सहमति !!

अरुण देव : बिलकुल नहीं...उत्तर आधुनिकता के शव गृह से परे- विचार जिन्दा है. चेतना और हाँ इतिहास भी..और इतिहास के बदलने की संभावना भी.

अशोक आत्रेय : किसी भी अच्छी रचना में शिल्प को कथ्य से अलग किया ही नहीं जा सकता हे यदि ...अगर अन्दर की बात कहूं तो शिल्प और कथ्य में ''अविनाभाव '' सम्बन्ध होती हैं ...

वंदना शुक्ल : अरुण जी ....एक कविता पलती है अंतर्विरोधों पर /लेकिन उन्हें ढँक नहीं पाती |संभवतः हर विधा इस कालगत उतार चढ़ाव के दौर से गुजरती है पर कुछ शक्तियां (प्रेरणाएँ /जुझारूपन)ऐसी भी होती हैं जो उन्हें मरने नहीं देतीं जिलाए रखती हैं |हिंदी रंगमंच इसका एक उदाहरण माना जा सकता है |अशोक बाजपाई संभवतः इसी समय् परक असमंजसता को स्वीकारते हुए कहते हैं ''यह एक ऐसा समय है जिसमे जीवन को संकुचित करने उसे रोकने और प्रभावित करने के सरे दैत्याकार उपकरण हमें ने विकसित किये हैं ऐसे में जीने की इच्छा का जो आग्रह है ,मै उसका कवि हूँ''कवि की यही जिजीविषा कविता को अंतहीन रखने का सामर्थ्य(हौसला) देती है |

अरुण देव : जहां तक यथार्थ का सवाल है. मार्क्सवादी आलोचना में अक्सर इसे उपन्यास और नाटक के संदर्भ में उठाया गया है. कविता कई बार मनवीय आकंक्षाओं की अभिव्यक्ति भी होती है,अक्सर उसका सौंदर्य भाषिक सृजनशीलता का होता है.इसकी व्याख्या यथार्थवाद के भीतर संभव नहीं है..महान कवि नेरूदा का एक कथन है -" जहां तक यथार्थवाद का सवाल है, मैं कविता में यथार्थवाद को पसन्द नहीं करता. कविता के यथार्थवाद विरोधी होने के हज़ार कारण है "

वंदना शुक्ल : नेरुदा के यथार्थ विरोधी होने का संभावित कारन उनकी वैचारिक प्रष्ठभूमि है |नेरुदा मार्क्सवाद के प्रवक्ता थे ,और उनकी कवितायेँ प्रायः राजनीती से प्रेरित थीं |क्या यथार्थ से इतर भी कोई रचना संभव है?अर्थात मात्र भाषिक सृजन शीलता के आधार पर ?क्या इसे ही अदम जेवेस्की कहते हैं ''एक ऐसा स्फुरण जो लेखक की आत्मा से उठता हो और पाठक की आत्मा में समां जाता हो?हमारे भीतर उस सबके निकट जाने की उत्कंठा हो जिसे शब्दों में बंधा नहीं जा सकता ?''

धनञ्जय सिंह : बहुत सही और जरुरी प्रश्न उठाया है अपने भाई मोहन श्रोत्रिय जी !.......

अशोक कुमार पाण्डेय एंगल्स ने एक कवि के पत्र के उत्तर में इस पर बहुत सटीक टिप्पणी की थी. उसे ढूंढ कर प्रस्तुत करता हूँ. लेकिन उससे पहले यह कि मेरा मानना यह रहा है कि कथ्य अपना शिल्प खुद ढूंढ लेता है. इसका उलटा करने की जो एक सचेत कोशिश पिछले दिनों लगातार दिख रही है उसके पीछे दो ही वजूहात हो सकती हैं - या तो यह कि कहाने के लिए कुछ खास हो ही ना...या यह कि जो कहा जा रहा है उस पर इतना कम विश्वास हो कि उसे पूरी तरह से ढँक-तोप दिया जाय...उलझा दिया जाय... 

मोहन श्रोत्रिय: ‎'कातिब' का यह अर्थ सिर्फ़ आपका है, अरुण. बेशक शब्दों के अर्थ बदलते जा रहे हैं, पर कातिब का अर्थ इतना नहीं बदल गया जितना आप दिखाना चाहते हैं. और अशोक, यह तो सभी मानते रहे हैं कि कथ्य अपना शिल्प खुद ढूंढ लेता है. शिल्प पर अतिरिक्त 'बल' और कथ्य/ अंतर्वस्तु का ऐसा 'घनघोर' नकार काफ़ी नया और चौंकाने वाला है. 'क्या' है जो कविता में व्यक्त होता है, उसे कोई तो नाम दिया ही जाएगा. शिल्प पर अतिरिक्त आग्रह या शिल्प को ही कविता का निर्णायक तत्व मान लेना, बड़ा 'अराजक-सा' प्रस्ताव है. यथार्थ को 'यथा-तथ्य' के अर्थ में लेकर, यथार्थ का खंडन करना तो और भी विचित्र लगता है. हर शब्द का मनमाना अर्थ तो कैसे चल सकता है, वह कातिब हो या यथार्थ या समय का प्रमुख स्वर. मानवीय आकांक्षाएं भी किसी शून्य में जन्म नहीं लेतीं, उनका भी एक सामाजिक परिप्रेक्ष्य होता है. 

दिवाकर घोष: बहुत कुछ टूट रहा है .फरमे से बाहर रही है कहानी और कविता . 

धीरेन्द्र अस्थाना : सभी से क्षमा मांगते हुए मैं निजी वक्तव्य आप के समक्ष रख रहा हूँ!
शब्द के अर्थ बदलते नहीं बदल जाते हैं अर्थ निकलने वाले ,रही बात कविता में बिम्ब ढूढना या बिम्ब के माध्यम से कथ्य;तो यह भी केदार नाथ जी के बिम्ब से कविता अपना आशय कहने में सक्षम है,समझने वाले इसे कविता का बिम्ब समझें या बिम्बात्मक कविता ,पर यथार्थ तो परिलक्षित है !यदि अलंकारों की आवश्यकता नहीं है तो उनका प्रयोग क्यों होता है?
हर कोई सूरदास जैसा ज्ञानी तो होता नहीं जो आत्मा की आँखों से सौन्दर्य बोध जगाये ! 

नवनीत पाण्डेय : श्रोत्रिय जी सच कहा आपने वर्तमान कहानी में अंतर्वस्तु का स्थान मानसिक अंतर्द्वन्द विकृतियों के कथ्य ने ले लिया है। कहानी कब, कहां,किसकी, क्यों शुरु और खतम हो जाती है पता ही नहीं चलता.. 

1 टिप्पणी:

  1. बहुत अच्छा संयोजन किया है, भाई, तुमने तो. दिन में बाहर था. लौटा तो नेट दो मिनट जुड़ता है, फिर कट जाता है.

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