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अपवृत्त

किस व्यथा से है व्यथित
किस हेतु कर रहा पश्चाताप
मिथ्या से होकर भ्रमित,
क्यों कर हो रहा तीव्र संताप!


निज को तू कब पहचानेगा
किस भ्रम से है अब भ्रमित ;
पूर्ण का अपूर्ण अंश है तू
व्यर्थ स्व को कर रहा श्रमित!


तज निज की अब यह तन्द्रा
स्वप्न मरीचिका से हो जागृत;
नश्वर है जो नहीं शास्वत ,
सर्व से ही है आगत-विगत !


अपूर्ण को कर दे पूर्ण,
वह पुन्य पथ है निर्वाण का;
अन्य पथ सभी भ्रम के;
करेंगे बाधित लक्ष्य त्राण का!


यह है तृष्णा की तपिश जो,
तू पुकारे हा तृष्णा, हा तृष्णा ;
होकर भ्रमित कृतिका से,
कर रहा तू ये जीवन मृष्णा!


फल की लिप्सा में तू क्यों कर,
कर्मच्युत हो रहा जीवन में !
जीवन तो है क्षणिक पर,अब
लक्ष्य चिंतन कर मन में !

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