हे मेरे मानव प्रियवर, मैं भी मानव हूँ; तुम करते आशाएं, मिले न मुझसे निराशाएं; करता मैं भी प्रयास पर, इस जग में मैं भी अभिनव हूँ; हे मेरे मानव प्रियवर, मैं भी मानव हूँ; तुम चाहते मेरे कर्मों में न त्रुटि हो, कैसे करूं कर्म, जिससे तुम्हें भी संतुष्टि हो; फिर भी जीवन में कर्मरत हूँ, तेरा ही तो बांधव हूँ; हे मेरे मानव प्रियवर, मैं भी मानव हूँ; चल रहा द्वंद्व मेरे भी अंतर भंवर में, दया,द्वेष,प्रेम, हर्ष है , मेरे भी उर में; नहीं मैं सर्वग्य, मैं भी अतिगव हूँ; हे मेरे मानव प्रियवर, मैं भी मानव हूँ; तुम चाहते जीवन के झंझावातों में सहारा दूं; लहरों की थपेड़ों में, डगमग होती नाव को किनारा दूं; तुम समझते वट विटप, मै भी पल्लव हूँ; हे मेरे मानव प्रियवर, मैं भी मानव हूँ; माया प्रपंच से मैं भी व्योमोहित हूँ; समर्पित हूँ पूर्ण पर कामना से लिप्त हूँ; नहीं मैं अमर्त्य मैं भी अवयव हूँ; हे मेरे मानव प्रियवर, मैं भी मानव हूँ; संघर्ष तो जीवन का आलम्बन है' सहिष्णु होना तो मानव का स्वालम्बन है; महाकाल से मैं भी अतिभव ...